Friday, January 13, 2012

श्लोक १०७

II श्रीराम समर्थ II




मना कोपआरोपणा ते नसावी।
मना बुद्धि हे साधुसंगी वसावी॥
मना नष्ट चांडाळ तो संग त्यागीं।
मना होइ रे मोक्षभागी विभागी॥१०७॥






जय जय रघुवीर समर्थ !

Friday, January 6, 2012

श्लोक १०६

II श्रीराम समर्थ II



बरी स्नानसंध्या करी एकनिष्ठा।
विवेके मना आवरी स्थानभ्रष्टा॥
दया सर्वभुतीं जया मानवाला।
सदा प्रेमळू भक्तिभावे निवाला॥१०६॥

Friday, December 30, 2011

श्लोक १०५

II श्रीराम समर्थ II 




विवेके क्रिया आपुली पालटावी।
अती आदरे शुद्ध क्रीया धरावी॥
जनीं बोलण्यासारिखे चाल बापा।
मना कल्पना सोडिं संसारतापा॥१०५॥
 


जय जय रघुवीर समर्थ !

Friday, December 23, 2011

श्लोक १०४

II श्रीराम समर्थ II 

क्रियेवीण नानापरी बोलिजेंते।
परी चित्त दुश्चीत तें लाजवीतें॥
मना कल्पना धीट सैराट धांवे।
तया मानवा देव कैसेनि पावे॥१०४॥
 


जय जय रघुवीर समर्थ !

Friday, December 16, 2011

श्लोक १०३

II श्रीराम समर्थ II 

हरीकीर्तनीं प्रीति रामीं धरावी।
देहेबुद्धि नीरूपणीं वीसरावी॥
परद्रव्य आणीक कांता परायी।
यदर्थीं मना सांडि जीवीं करावी॥१०३॥
  

 जय जय रघुवीर समर्थ !

Friday, December 9, 2011

श्लोक १०२

II श्रीराम समर्थ II 

अती लीनता सर्वभावे स्वभावें।
जना सज्जनालागिं संतोषवावे॥
देहे कारणीं सर्व लावीत जावें।
सगूणीं अती आदरेसी भजावें॥१०२॥


जय जय रघुवीर समर्थ !

Friday, December 2, 2011

श्लोक १०१

II श्रीराम समर्थ II 

 
जया नावडे नाम त्या यम जाची।
विकल्पे उठे तर्क त्या नर्क ची ची॥
म्हणोनि अती आदरे नाम घ्यावे।
मुखे बोलतां दोष जाती स्वभावें॥१०१॥



जय जय रघुवीर समर्थ !

Saturday, November 26, 2011

श्लोक १००

II श्रीराम समर्थ II


यथासांग रे कर्म तेंहि घडेना।
घडे धर्म तें पुण्य गांठी पडेना॥
दया पाहतां सर्व भुतीं असेना।
फुकाचे मुखी नाम तेंही वसेना॥१००॥

डॉक्टर सुषमाताई वाटवे यांचे या श्लोकावरिल श्राव्य निरूपण


जय जय रघुवीर समर्थ !

श्लोक ९९

II श्रीराम समर्थ II



डॉक्टर सुषमाताई वाटवे यांचे या श्लोकावरिल श्राव्य निरूपण


जय जय रघुवीर समर्थ !
जगीं धन्य वाराणसी पुण्यराशी।
तयेमाजि आतां गतीं पूर्वजांसी॥
मुखे रामनामावळी नित्य काळीं।
जिवा हित सांगे सदा चंद्रमौळी॥९९॥

Friday, November 11, 2011

श्लोक ९८

II श्रीराम समर्थ II

 
हरीनाम नेमस्त पाषाण तारी।
बहु तारीले मानवी देहधारी॥
तया रामनामीं सदा जो विकल्पी।
वदेना कदा जीव तो पापरूपी॥९८॥


जय जय रघुवीर समर्थ !