II श्रीराम समर्थ II
जय जय रघुवीर समर्थ !
बहू शापिता कष्टला अंबऋषी।
तयाचे स्वये श्रीहरी जन्म सोशी॥
दिला क्षीरसिंधु तया ऊपमानी।
नुपेक्षी कदा देव भक्ताभिमानी॥११६॥
जय जय रघुवीर समर्थ !
मना सर्वदा सज्जनाचेनि योगें। |
क्रिया पालटे भक्तिभावार्थ लागे॥ |
क्रियेवीण वाचाळता ते निवारी। |
तुटे वाद संवाद तो हीतकारी॥१०८॥ |
मना सर्वदा सज्जनाचेनि योगें। |
क्रिया पालटे भक्तिभावार्थ लागे॥ |
क्रियेवीण वाचाळता ते निवारी। |
तुटे वाद संवाद तो हीतकारी॥१०८॥ |