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Friday, September 13, 2013
श्लोक १९१
।। श्रीराम समर्थ ।।
देहेबुद्धिचा निश्चयो ज्या ढळेना।
तया ज्ञान कल्पांतकाळी कळेना॥
परब्रह्म तें मीपणे आकळेना।
मनी शून्य अज्ञान हे मावळेना॥१९१॥
जय जय रघुवीर समर्थ !
Friday, September 6, 2013
श्लोक १९०
।। श्रीराम समर्थ ।।
नव्हे कार्यकर्ता नव्हे सृष्टिभर्ता।
पुरेहून पर्ता न लिंपे विवर्ता॥
तया निर्विकल्पासि कल्पित जावे।
परि संग सोडुनि सुखे रहावे॥१९०॥
जय जय रघुवीर समर्थ !
Friday, August 30, 2013
श्लोक १८९
।। श्रीराम समर्थ ।।
मही निर्मिली देव तो ओळखावा।
जया पाहतां मोक्ष तत्काळ जीवा॥
तया निर्गुणालागी गूणी पहावे।
परी संग सोडुनि सुखे रहावे॥१८९॥
जय जय रघुवीर समर्थ !
Friday, August 23, 2013
श्लोक १८८
।। श्रीराम समर्थ ।।
देहेभान हे ज्ञानशस्त्रे खुडावे।
विदेहीपणे भक्तिमार्गेचि जावे॥
विरक्तीबळे निंद्य सर्वै त्यजावे।
परी संग सोडुनि सुखी रहावे॥१८८॥
जय जय रघुवीर समर्थ !
श्लोक १८७
।। श्रीराम समर्थ ।।
भुते पिंड ब्रह्मांड
हे ऐक्य आहे।
परी सर्वही स्वस्वरुपी न साहे॥
मना भासले सर्व काही पहावे।
परी संग सोडुनि सुखी रहावे॥१८७॥
जय जय रघुवीर समर्थ !
Sunday, August 11, 2013
श्लोक १८६
||
श्रीराम समर्थ॥
सदा सर्वदा राम सन्नीध आहे।
मना सज्जना सत्य शोधुन पाहे॥
अखंडीत भेटी रघूराजयोगू।
मना सांडीं रे मीपणाचा वियोगू॥१८६॥
जय जय रघुवीर समर्थ !
Friday, August 2, 2013
श्लोक १८५
II श्रीराम समर्थ II
लपावे अति आदरे रामरुपी।
भयातीत निश्चीत ये स्वस्वरुपी॥
कदा तो जनी पाहतांही दिसेना।
सदा ऐक्य तो भिन्नभावे वसेना॥१८५॥
जय जय रघुवीर समर्थ !
Friday, July 26, 2013
श्लोक १८४
II श्रीराम समर्थ II
नव्हे तोचि जाले नसे तेचि आले।
कळो लागले सज्जनाचेनि बोले॥
अनिर्वाच्य ते वाच्य वाचे वदावे।
मना संत आनंत शोधीत जावे॥१८४॥
डॉक्टर सुषमाताई वाटवे यांचे या श्लोकावरिल श्राव्य निरूपण
जय जय रघुवीर समर्थ !
Sunday, July 21, 2013
श्लोक १८३
II
श्रीराम
समर्थ
II
जनी भक्त ज्ञानी विवेकी विरागी।
कृपाळु मनस्वी क्षमावंत योगी॥
प्रभु दक्ष व्युत्पन्न चातुर्य जाणे।
तयाचेनि योगे समाधान बाणे॥१८३॥
डॉक्टर सुषमाताई वाटवे यांचे या श्लोकावरिल श्राव्य निरूपण
जय
जय
रघुवीर
समर्थ
!
Friday, July 12, 2013
श्लोक १८२
II श्रीराम समर्थ II
नव्हे वाउगी चाहुटी काम पोटी।
क्रियेवीण वाचाळता तेचि मोठी॥
मुखे बोलिल्यासारिखे चालताहे।
मना सद्गुरु तोचि शोधुनि पाहे॥१८२॥
डॉक्टर सुषमाताई वाटवे यांचे या श्लोकावरिल श्राव्य निरूपण
जय जय रघुवीर समर्थ !
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